Thursday, December 15, 2016

घर के बूढ़े लोग - ज्योति शेखर

सारी उम्र जिन्हें ढोते हैं घर के बूढ़े लोग !
उनके लिए बोझ होते हैं घर के बूढ़े लोग !!

उन्हें पता है जब ये पकेगी तब वे नहीं होंगे,
फिर भी नई फ़सल बोते हैं घर के बूढ़े लोग !

बच्चे कहते हैं, तहज़ीब नयी क्या सीखेंगे,
ये सब तो बूढ़े तोते हैं घर के बूढ़े लोग !

कभी देखना एक उजाला फैला रहता है,
जहाँ फ़रिश्तों से सोते हैं घर के बूढ़े लोग !

कभी-कभी जब और किसी बूढ़े से मिलते हैं,
चुपके-चुपके क्यों रोते हैं घर के बूढ़े लोग !

इनको छुओ साँप बनकर तब  भी ठंडक देंगे,
चंदन का दरख़्त होते हैं घर के बूढ़े लोग !

बोझ पाप का बढ़े तो इनके क़दमों में रख दो,
तीरथ हैं, गुनाह धोते हैं, घर के बूढ़े लोग !

मैं यायावर गुन्जन हूँ - रामस्वरूप सिन्दूर

मैं यायावर गुन्जन हूँ

जैसे-जैसे दृगबन्ध खुले,
मटमैले सपने रंग धुले,
कोई सुरंग मुझ को मधुवन में छोड़ गयी !
हीरक हथकड़ियाँ, स्वर्ण बेड़ियाँ तोड़ गयी !

मैं बन्दी-राजकुँअर की नियति जी रहा था
पर, कोई भी कल्पना मूर्त हो जाती थी,
तृप्ति के कमल खिलते थे राजसरोवर में
मुक्ति की कामना फिर भी बहुत सताती थी,
खंडित सुरंग, मुझको फिर मुझसे जोड़ गयी !
हीरक हथकड़ियाँ, स्वर्ण बेड़ियाँ तोड़ गयी !


दंशित-तन का विष पिया एक निर्झरणी ने
श्वास का कलुष बह गया तरंगित गन्धों में,
जीती-मरती माटी का काया-कल्प हुआ
सीमान्त सृष्टि सिमटी मेरे भुजबंधों में,
दुर्बल सुरंग, काल की कलाई मोड़ गयी !
हीरक हथकड़ियाँ स्वर्ण बेड़ियाँ तोड़ गयी !

मैं यायावर गुन्जन हूँ पुष्पक घाटी का
मैं महाप्रलय में भी अक्षय लय गाऊँगा,
डूबेंगे जब हिमसृंग अतल जलप्लावन में
शब्द के कंठ में बैठ नाद हो जाऊँगा,
सर्पिल सुरंग, अंजलि में अमृत निचोड़ गयी !

हीरक हथकड़ियाँ, स्वर्ण बेड़ियाँ तोड़ गयी !

Monday, December 12, 2016

घर में भी सम्मान मिला है - रामस्वरूप सिन्दूर


घर में भी सम्मान मिला है

मैं प्रसंगवश कह बैठा हूँ तुमसे अपनी राम-कहानी !

मेरे मनभावन मन्दिर में बैठी हैं खण्डित प्रतिमाएं,
विधिवत् आराधन जारी है, हँसी उड़ाती दसों दिशाएं,
मूक वेदना के चरणों में, मुखर वेदना नत-मस्तक है,
जितनी हैं असमर्थ मूर्तियाँ, उतना ही समर्थ साधक है,
एक ओर ज़िन्दगी कामना, एक ओर निष्काम कहानी !



बिखर गई ज़िन्दगी कि जैसे बिखर गई रत्नों की माला,
कोहनूर कोई ले भागा, तन का उजला मन का काला,
हारा मेरा सत्य कि जैसे, सपना भी न किसी का हारे,
साँसों-वाले तार चढ़ गये, जो वीणा के तार उतारे,
ख़ास बात ही तो बन पाती है, दुनिया की आम-कहानी !


एक ज्वार ने मेरे सागर को शबनम में ढाल दिया है,
कहने को उपकार किया है, करने को अपकार किया है,
प्रखर ज्योति ने आँज दिया है, आँखों में भरपूर अँधेरा,
मैं इस तरह हुआ जन-जन का, कोई भी रह गया न मेरा,
कामयाब है जितनी, उतनी ही ज़्यादा नाकाम कहानी !

निर्वसना प्रेरणा कुन्तलों बीच छिपाये चन्द्रानन है,
आँसू ही पहचान सकेगा, लहरें गिन पाया सावन है
मेरा यह सौभाग्य, कि मुझको हर अभाव धनवान मिला है
पीड़ा को बाहर जैसा-ही, घर में भी सम्मान मिला है

नाम कमाने की सीमा तक, हो बैठी बदनाम कहानी !

सुधा भी पी नहीं जाती - रामस्वरूप सिन्दूर


सुधा भी पी नहीं जाती

आज को मैंने जिया कल कि प्रतीक्षा में !
एक छल है, दूसरे छल की प्रतीक्षा में !

बह गयी आकाशगंगा में करुण-गाथा,
गा रहा मैं अरुण छंदों में, वरुण-गाथा, 
ये नयन हैं, कौन-से जल की प्रतीक्षा में !
एक छल है, दूसरे छल की प्रतीक्षा में !


आँसुओं का अतल मन्थन कर चुका हूँ मैं,
रत्न-कोषों को अमृत से भर चुका हूँ मैं,
कल्पतरु भी है, किसी फल की प्रतीक्षा में !
एक छल है, दूसरे छल की प्रतीक्षा में !

अब तृषा को तृप्ति की सुधि भी नहीं आती,
वारुणी तो क्या सुधा भी पी नहीं जाती,
चल-अचल पल हैं, सकल-पल कि प्रतीक्षा में !

एक छल है, दूसरे छल की प्रतीक्षा में !

माखन-चोर कल था - रामस्वरूप सिन्दूर

माखन-चोर कल था

सेज फूलों की सजाये चाँद बैठा,
ज़िन्दगी बैराग के भुजपाश में है !

लोग कहते हैं कि मैंने सोम-घट जूठे किये हैं,
मानसर की बात क्या, सातों समन्दर पी लिये हैं,
आम-चर्चा है, कि मेरी, प्यास है गुमराह छोरी,
कल अमृत से खेलती थी, आज विष में उम्र-बोरी,

कान का कच्चा जहाँ है,
आँख क्या जाने कहाँ है,
शीश पर सूरज, चतुर्दिक धूनियाँ हैं
प्राण मेरा, आग के भुजपाश में है !


क़ैद हूँ मैं संयमी दीवार में, पहरे कड़े हैं,
जिस तरफ़ नज़रें उठाऊँ, विष-बुझे भाले जड़े हैं,
गुनगुनाहट भी, परिधि के पार जा पाती नहीं है,
फूल है जिस ठौर, बंदी गन्ध भी बैठी वहीँ है,

जो मुझे नकली बताये,
श्वास मेरे पास आये,
बेबसी की गोद में चन्दन पड़ा है
और ख़ुशबू, नाग के भुजपाश में है !

इस जवानी में हठी संगीत सन्यासी हुआ है,
अनथके अवरोह ने गहराइयों का तल छुआ है,
मैं वहाँ पर हूँ, जहाँ बजती नहीं शहनाइयाँ हैं,
बोलती परछाइयों से, गूँजती तनहाइयाँ हैं,

उम्र जो नगमा दबाये,
भूलती है भूल जाये,
कामना का नाम मीरा हो गया है
आज अंजलि, त्याग के भुजपाश में है !

आइने पर चोट पहली नक्श हो कर रह गयी है,
किस तरह भूलूँ कहानी, जो अनागत से नयी है,
गीत माखनचोर कल था, सारथी है आज मेरा,
यों बुझा मेरा सवेरा, हो गया रौशन अँधेरा,

दर्द के मुँह पर हँसी है,
बात कुछ ऐसी फँसी है,
हाथ फैलाये गगन बेसुध खड़ा है

कीर्ति मेरी, दाग के भुजपाश में है !

गौरैया - मणि मोहन

गौरैया 

स्कूल गयी गई है गौरैया 
अभी घर में पसरा है सन्नाटा 
पौने तीन बजे होगी छुट्टी 
तीन बजे तक लौटेगी गौरैया 

आते ही फेकेगी अपने जूते 
बरामदे में 
और बस्ता ड्राइंगरूम में 
(कभी इसका उलट 
बस्ता बरामदे में 
और जूते ड्राइंगरूम में)

कैसा रहा स्कूल ? पूछेगी माँ 
तिरछी नज़रों से देखेगी 
अपनी माँ को 
फिर झटकेगी अपने पंखों से 
मरे हुए शब्दों की धूल 
और मुस्करायेगी ...........

और फिर 
चहक उठेगा पूरा घर 
बस आती होगी गौरैया 

Tuesday, December 6, 2016

खो गयी है सृष्टि-राम स्वरूप 'सिन्दूर'

खो गयी है सृष्टि

दीप को जल में विसर्जित कर दिया मैंने !
इस अँधेरी रात में, यह क्या किया मैंने !

यूँ लगे, जैसे नदी में बह गया हूँ मैं,
तीर पर यह कौन बैठा रह गया हूँ मैं,
एक क्षण, पूरे समर्पण का जिया मैंने !

मिट गया अन्तर, सुरभियों और श्वासों में,
छोड़ यह तन, छिप गया सब कुछ कुहासों में,
अमृत से बढ़ कर, तृषा का रस पिया मैंने !

खो गयी है सृष्टि, या- फिर खो गया हूँ मैं,
जन्म के पहले प्रहर-सा, हो गया हूँ मैं,
काल-जैसे कुशल ठग को, ठग लिया मैंने !