Tuesday, September 30, 2014

हँसना सुकून दे औ' न रोना सुकून दे ! - प्रोफे. राम स्वरुप 'सिन्दूर'

हँसना सुकून दे औ' न रोना  सुकून दे !
मुझको, मेरा वजूद न होना सुकून दे !!

आँखों से कूच कर गये ख़्वाबों के काफ़िले ,
पूरे सुकून में भी न सोना,  सुकून दे !

एक नूर की तलाश है गर्दो-गुबार में ,
अब चाँदनी का साथ न होना, सुकून दे !

यारब ! मैं आ गया हूँ कहाँ किस मक़ाम पर ,
मुझको तो अब सुकून न होना , सुकून दे !

कब से मुझे तलाश है उस बेक़रार की ,
जिसको मेरा सुकून में होना , सुकून दे !

हद से गुजर गये हैं हकीक़त के दायरे ,
आखों में कोई ख़्वाब न होना सुकून दे ! ,

बातें हुआ करें तमाम कायनात से ,
अपने से कोई बात न होना सुकून दे !

'सिन्दूर' की दुश्मन है ये दुनिया , तो क्यों इसे,
'सिन्दूर' का तबाह न होना , सुकून दे !

"बहुत अच्छी लगती हैं मेंड़ें खेतों की सचाई के लिए, - रमेश रंजक

"बहुत अच्छी लगती हैं मेंड़ें
खेतों की सचाई के लिए,

कितनी प्यारी लगती हैं कुर्सियाँ
भलाई के लिए,

बहुत मौजूँ लगती हैं दीवारें
घरों की सुरक्षा के लिए

बहुत भली लगती हैं खाइयाँ
किलों के आस-पास,

कितनी सुन्दर लगती हैं घाटियाँ
तराई के लिए

लेकिन...
ये मेड़ें, ये कुर्सियाँ, ये दीवारें...
मुझे हरगिज मंजूर नहीं
आदमी और आदमी के बीच..."

Saturday, September 27, 2014

तमाम प्रयासों के बाद भी टूटता नहीं वो - अनिल सिन्दूर

मित्र ,
तमाम प्रयासों के बाद भी
टूटता नहीं वो
हथोड़ों की चोट से भी नहीं
और न ही संवेदनाओं के आहत होने से
चोट दर चोट
और मजबूत हुआ है वो
लोहे की तरह !

प्रयास जारी रखना
क्यों कि तुम्हें नहीं मालूम
तुम हार गये तो
हार जायेगा वो भी !!


Friday, September 26, 2014

सुबह छूटी शामें साधते रहे हम तुम - नईम

सुबह छूटी
शामें साधते रहे हम तुम

धुन्धवाते सूरज रात-दिन
तापते रहे हम तुम

मंझली माँ संझली दी
बड़की भौजाई
बजरे बूढर ,  सांवरे पिता
बड़े भाई !
देवता सिराने
आराधते रहे हम तुम !

छाती पर धरी हुई
क्वारीं आशायें
ब्याही कम
ज्यादातर उम्ररसीदायें
लक्षमन रेखाओं से
बांधते रहे हम तुम









Thursday, September 25, 2014

रखो अपने विमर्श अपने पास - दिलीप वसिष्ठ

रखो अपने विमर्श अपने पास
रोज सुबह उठकर चपड चपड करते रहो।।
तुम्हे साधन भी मिले है
और संसाधन भी।।।
न तुम्हे नारित्व का पता है
न पौरूष का....
यह लिङ्ग भेद नही
उससे आगे की जीजिविषा है।।।
तुम लडते रहो
अपने सुख को अभिशाप करके...
हमे तो जीना है भाई......।।
न मुझे रोटी बनाने और बर्तन मलने
से आपत्ति है।।
और न उसे बोझा ढोने से.....
साहब ज़िन्दगी कौन सी
इत्र है
तुम्हारे संडास से पूछना।।।।
यहाँ तो
सडक के किनारे भी
मेंहदी के पौधे लगे है...
देखना है तो
सडक बनाने आ जाओ.....।।।

इंच - इंच सरक रहा है - मणि मोहन मेहता

इंच - इंच सरक रहा है
घाटी पर
सरियों से लदा हाथ ठेला
अपनी पूरी ताकत झोंक दी है
पसीने से लथपथ
उस ठेलेवाले ने
एक होड़ जारी है
भीतर के लोहे की
बाहर के लोहे के साथ
देखो
पसीना बह रहा है
झरने की तरह ।

बादल भी है, बिजली भी है, पानी भी है सामने - रमानाथ अवस्थी

बादल भी है, बिजली भी है, पानी भी है सामने
मेरी प्यास अभी तक वैसी, जैसी दी थी राम ने

प्यास मुझे ही क्या, यह जग में सबको भरमाती है
जिसमें जितना पानी, उसमें उतनी आग लगाती है
आग जलती ही है, चाहे भीतर हो या बाहर हो
चलने वाले से क्या कहिये, पानी हो या पाथर हो

छांव उसी की है, जिसको भी गले लगाया घाम ने
मेरी प्यास अभी तक वैसी, जैसी दी थी राम ने

मेरे चारों ओर लगा है , मेला चार दिशाओं का
जिसमें शोर बहुत है, कम है अर्थ ह्रदय के भाव का
मैं बिल्कुल वैसा ही हूँ, इस अंतहीन कोलाहल में
जैसी कोई आग ढूढती हो छाया दावानल में

मेरी जलन न जानी अब तक किसी सुबह या शाम ने
मेरी प्यास अभी तक वैसी, जैसी दी थी राम ने

घन से लेकर घूँघट तक के आंसू से परिचय मेरा
हर आंसू की आग अलग है, एक मगर जल का घेरा
कोई आंसू दिखलाता है, कोई इसे छिपाता है
कोई मेरी तरह अश्रु को गाकर जी बहलाता है

आंसू क्या वे समझे, जिनको सोख लिया घन घाम ने
मेरी प्यास अभी तक वैसी, जैसी दी थी राम ने