Friday, July 31, 2015

आदमी खुद को कभी यूँ भी सज़ा देता है, - गोपालदास नीरज

आदमी खुद को कभी यूँ भी सज़ा देता है,
रोशनी के लिए शोलों को हवा देता है !

खून के दाग़ हैं दामन पे जहाँ संतों के
तू वहां कौन-से नानक को सदा देता है !

एक ऐसा भी वो तीरथ है, मेरी धरती पर,
क़ातिलों को भी जहाँ मंदिर भी दुआ देता है !

मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है.
भूखे लोंगों को जो सेहत की दवा देता है !

तू खड़ा होके कहाँ माँग रहा है रोटी,
ये सियासत का नगर सिर्फ़ दग़ा देता है !

मैं किसी बच्चे के मानिन्द सिसक उठता हूँ,
जब कोई माँ की तरह मुझको दुआ देता है !

मत उसे ढूंढए शब्दों के नुमाइशघर में,
हर पपीहा यहाँ 'नीरज' का पता देता है ! 

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