Tuesday, April 28, 2015

एक ग़ज़ल दुष्यंत कुमार की



रोज़ जब रात को बारह का गज़र होता है,
यातनाओं  के  अँधेरें  में सफ़र होता है !

कोई रहने की जगह है मेरे सपनों के लिए,
वो घरौंदा सही, मिट्टी का भी घर होता है !

सिर के सीने में कभी, पेट से पावों में कभी,
एक जगह हो तो  कहें  दर्द  इधर होता है !

ऐसा लगता है कि उड़कर भी कहाँ पहुँचेंगें,
हाथ में जब कोई टूटा हुआ पर होता है !

सैर के वास्ते सड़कों पर निकल आते थे ,

अब तो आकाश से पथराव का डर होता है !

Thursday, April 16, 2015

कश्मीर अलगाव वादियों के नाम एक ग़ज़ल - महेश कटारे सुगम

ज़ुल्म के तल्ख अंधेरों के तलबगार हो तुम 
जानता हूँ मेरे दुश्मन के मददगार हो तुम 

जिसके हर शब्द में इक मौत नज़र आती हो
आज के दौर का खूंखार सा अख़बार हो तुम

तुमने घर घर में ज़राइम को पनाहें दीं हैं
एक मेरे नहीं दुनिया के गुनहगार हो तुम

देखना एक दिन तुमसे ये कहेगी दुनिया
खौफ खाए हुए हालात से बेज़ार हो तुम

तुम जो चाहो तो ज़माने को बदल सकते हो
वक्त के साथ हो काबिल हो समझदार हो तुम

ये तो समझो की कहाँ साथ खड़े हो किसके
हाथ वो कौन है जिसके बने हथियार हो तुम



मौत के साथ मुहब्बत का सफर होगा क्या
वो यही सोच है जिसके कि तरफदार हो तुम

अब जाम निगाहों से पिलाने नहीं आते - मंजु अग्नि



अब जाम निगाहों से पिलाने नहीं आते ,
वो झूठी मुहब्बत भी जताने नहीं आते !!

आग़ोश में हैं चाँद सितारे अभी उनके ,
मजबूर हैं वो रात बिताने नहीं आते !!

गुल भी नहीं ख़ुशबू-ए-तमन्ना भी नहीं है ,
दस्त-ए-दुआ को फूल उगाने नहीं आते !!

जज़्बात के बादल तो बरसते हैं घनेरे ,
दरिया हमे अश्क़ो के बहाने नहीं आते !!

ये दर्द मेरी ज़िन्दगी भर की है कमाई ,
बेबात अजी ग़म के ख़ज़ाने नहीं आते !!

यूँ तो हैं मुहब्बत के तलबगार हज़ारों ,
पर हर किसी को नख़रे उठाने नहीं आते !!heart इमोट " मंजु अग्नि "

महावर की धूमिल सी छाप - दिव्या शुक्ला


पत्थरों के इस महल में
कुछ आलता रंगे क़दमों
के धूमिल से निशान दिखे
वर्षों पहले नवाँकुरित सपनों को
आँचल में सहेजे गृह प्रवेश करती
किशोरी नववधू के भीतर आते
पाँवों की छाप कुछ धूमिल सी थी


और कुछ चटक सी लगती कभी
अरे बस एक हाथ की दूरी पर
बाहर की ओर जाते क़दमों के
निशान सुर्ख़ लाल चटक से
किसके हैं  ? ध्यान से देखो
इन पत्थरों की गूँगी बहरी
दीवारों की दरारों में
अपनी उम्र के सारे बसंत भर
पतझर लिये इस ऊँची ड्योढ़ी
को लाँघ कर बाहर जाती हुई
उसी किशोरी के तलवों से
रिसते हु़ये रक्त की छाप है

Thursday, April 2, 2015

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख - दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख !

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाजुओं को देख, पतवारें न देख !

अब यक़ीनन ठोस है धरती हक़ीकत की तरह,
यह हक़ीकत देख, लेकिन खौफ़ के मारे न देख !

वे सहारे भी नहीं अब, जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख !

दिल को बहला ले, इज़ाज़त है, मगर इतना न उड़,
रोज सपने देख, लेकिन इस क़दर प्यारे न देख !

ये धुंधलका है नज़र का, तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख, दीवारों में दीवारें न देख !

राख, कितनी राख है चारों तरफ़ बिखरी हुई,
राख में चिंगारियां ही देख, अंगारे न देख !