Saturday, February 1, 2014

चिता जहाँ मेरी सजती हो कविता पाठ वहीँ कर लेना - कृष्ण मुरारी पहारिया


आज आपको एक ऐसे रचनाकार का परिचय देता हूँ जिसका पूरा जीवन अभावों के सुख से बीता ! उसके गीतों का बेमिशाल संग्रह प्रगतिशीलता का आवरण ओढ़े रचनाकारों के दुराग्रह की भेंट चढ़ गया ! रचनायें  टकसाली होने के कारण प्रगतिशील रचनाकारों ने दोयम दर्जा देकर अलग थलग कर दिया ! बाँदा निवासी कृष्ण मुरारी पहारिया रेलडाक व्यवस्था के विगलक पद पर तैनात रहे ! वो सूर, कबीर और निराला को अपने पुरखे मानते थे ! वो मानते थे की इन्हीं पुरखों से उन्होंने  विरासत में बहुत कुछ पाया ! सादगी से भरे इस रचनाकार की एक कृति ‘यह कैसी दुर्धर्ष चेतना’ १९९८ में उरई (जालौन) के सहयोगियों से प्रकाशित हो सकी ! आज भी ४०० के लगभग अप्रकाशित गीत उनकी हस्त लिखित डायरी में प्रकाशित होने का इंतजार कर रहीं हैं ! आज वो इस दुनिया में नहीं हैं उनकी वो टकसाली रचनाएँ अब प्रवुद्ध जन कभी पढ़ भी पाएंगे ?

चिता जहाँ मेरी सजती हो, कविता पाठ वहीँ कर लेना
प्राणों को लय पर तैराकर, अच्छी तरह विदा कर देना

अगर सगे सम्बन्धी मेरे, चिता सजा कर रोयें धोयें
उनसे बस इतना कह देना, कांटे अंतिम बार न बोयें
जब तक सांसें रही देह में, तब तक की सेवा क्या कम है
चलते समय आँख गीली क्यों और पूछना कैसा गम है

वे स्वतंत्र हैं उनकी नैया, उनके हाथ उन्हीं का खेना

तुम पर मेरा, मेरे मित्रों और नहीं इतना तो ऋण है
सारी रचना तुम्हें समर्पी, जैसे हरी दूब का तृण है
उस तृण की शीतलता पीकर, कभी ह्रदय सहलाया होगा
भटका हुआ पिपासित यह मन, क्षण भर को बहलाया होगा
 

इतना करना मेरी खातिर, खड़ी रहे छंदों की सेना

कृष्ण मुरारी पहरिया





2 comments:

  1. बहुत सुन्दर कविता है।
    आप सब को हार्दिक शुभकामनायें।

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