Saturday, December 20, 2014

हम तुम में डूब जाते,.............. प्रोफे. रामस्वरूप ‘सिन्दूर’

हम तुम में डूब जाते, तुम हम में डूब जाते !
सागर जहान-भर के, शबनम में डूब जाते !

कुछ दूसरी न होती संयोग की कहानी,
आंसू से बच निकलते संगम में डूब जाते !


हम जो हैं वो न होते, आंसू जो ये न होते,
सागर की उम्र पा-के उदगम में डूब जाते !

आंसू जो अर्चना से ऊबे, तो मय उठा ली,
गहरे ही डूबना था सरगम में डूब जाते !

‘सिन्दूर’ रुढियों से रिश्ता न तोड़ देते,
इस क्रम में डूब जाते, उस क्रम में डूब जाते !



No comments:

Post a Comment