Wednesday, September 10, 2014

मैं जब भी आराध्य भाव में देखता हूँ शिवलिंग - विशाल कृष्ण सिंह

मैं जब भी
आराध्य भाव में देखता हूँ
शिवलिंग
तो अंतः गहरे महसूसता हूँ
श्रृष्टि के अकाट्य सत्य को ,
रचना की संस्कृति की
साहचर्य के सम्मान को |

आश्चर्य से महसूसता हूँ
कि कितने गहरे जुड़े है
स्त्री पुरुष का सम्बंध
सृजन में
जनन में
रचना में
निराशा से देखता हूँ
अपने आस पास
विकृति
सच
भ्रम
असम्मान
कि मिलन तो
एक प्रार्थना है
आत्मिक स्वीकृति है
एक जिम्मेदारी है
जननी के सच्चे स्वरूप के प्रति
बेहद जरूरी है हमारा
सम्बन्ध में शिव होना
और देख पाना
अपने देह में छिपी आधी स्त्री |

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