Saturday, May 10, 2014

सुकुमार चाँदनी रही झूल उन्मत्त चाँद की बाँहों में ! - जगदीश गुप्त

सुकुमार चाँदनी रही झूल उन्मत्त चाँद की बाँहों में !

उर पर लहरे काले कुंतल ,
ज्यों उमड़ चली यमुना की लहरें
लो डूब गये दो ताजमहल ,
पुलकित सपनों की चहल-पहल ,

किरणें भोलापन गयीं भूल , ताम-सघन कुञ्ज की छांहों में !

अधरों पर जूही उठी विहँस ,
आकाश-कुमुदनी की पाँखुरियाँ
अंग-अंग पर गयीं बरस ,
मन हरसिंगार-सा उठा विकस ,

खिल उठे स्पर्श के विपुल फूल , रस-स्निग्ध प्रणय की राहों में !

नत पलकों में अधमुंदे भँवर ,
ज्यों खोल रहे धीरे-धीरे -
घन वरुनिजाल में उलझे पर ,
सांसें सुनती सांसों के स्वर ,

खिंच गया लाज का श्लथ दुकूल , अनगिन अनबोली चाहों में !

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