Sunday, April 13, 2014

ब्रह्मदेव बन्धु की एक ग़ज़ल

अजीब शहर है खुद को संभाल कर रखिये
हो जाये वार न ढालें निकाल कर रखिये


वो कोलतार गरम दूर तक जो फैला है
ये पाँव अपने ज़रा देख भाल कर रखिये


ये ज़िन्दगी तो फटी-सी क़मीज़ है यारो
इसे जनाब कहाँ तक संभाल कर रखिये


तमाम दर्द ज़माने में फिर भी हँसना है
नकाब आप तो चेहरे पे डाल कर रखिये


संवार लेते हो चेहरे की सिलवटों को तुम
पड़ी जो झुर्रियां दिल में न टाल कर रखिये

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