Monday, April 7, 2014

करतल चूमे संन्यास -प्रोफे. राम स्वरुप 'सिन्दूर'

झंकृत धरती आकाश,
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने !

अनुगुंजित अन्तर की घाटी,
नर्तित चलती-फिरती माटी;
बाँसुरी बनी नि:श्वास,
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने !

जैसे हो वंदन की वेला,
अर्चन-अभिनन्दन की वेला;
मुखरित निर्जन-अधिवास,
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने !

सुधियों ने अवगुण्ठन खोले,
किसलय-दल-सा संयम डोले;
करुणा-विगलित उल्लास,
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने !

युग से सूखे दृग, तरल हुए,
पहले-जैसे ही सरल हुए;
करतल चूमे संन्यास,
प्राण के तार छू दिये प्राणों ने !

No comments:

Post a Comment